फेसबुक विवाद और भारतीय लोकतंत्र की हत्या का महत्वपूर्ण विश्लेषण | Hate speech in india

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Hate speech in india
फेसबुक विवाद

    

Hate speech in india

Hate speech in india–  भारतीय लेाकतंत्र सात दशक पूरे कर रहा है और इस समय संकट में हैं। यह कोई राहत की बात नहीं है कि सारे संसार में लोकतंत्र खतरे में हैं, बिखर रहे हैं और तानाशाही वृत्तियाँ उभार पर हैं। विडंबना यह है कि अकसर लोकतंत्र को खतरे लोकतंत्र के अंदर से ही पैदा होते हैं।

हमारे यहाँ, जैसे कि लोकतंत्र के विश्व-इतिहास में और देशों में ही, लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन कर नागरिकता, विचार, अभिव्यक्ति, निजी स्वतंत्रता, सामुदायिकता सद्भाव और परस्परता, जवाबदेही, नैतिक बोध और जिम्मेदारी, अल्पसंख्यकों के अधिकारों आदि सभी में, कानून-मीडिया प्रचार और प्रसार के माध्यमों के दुरुपयोग, हिंसा और क्रूरता का सहारा लेकर, कटौती की जा रही है।

विचित्र यह है कि लोकतंत्र के तराजू पर सत्ता, राजनीति, धर्म, मीडिया, आदि सभी हलके उतर रहे हैं। लोकतंत्र को जिस तरह से बहुसंख्यकवाद का उपकरण बनाया जा रहा है, वह न तो संविधान की आत्मा के अनुरूप है, न भारतीय परंपरा और संस्कृति के अनुरूप है।

      सोशल मीडिया के सबसे बड़े मंच, फेसबुक Hate speech in india को लेकर विवादों में आया है, जिसका प्रमुख कारण दिल्ली दंगों, व भारत में हेटस्पीच ( Hate speech in india ) को लेकर हुए साम्प्रदायिक हिंसाओं में भड़काऊ भाषाणों व साम्प्रदायिक कंटेट (सामग्री) को नजरअंदाज किया जिसका सत्तारूढ़ पार्टी ने फायदा उठाया है।

      हाल ही में अमरिका के अखबार ‘‘वाल स्ट्रीट जर्नल‘‘, में छपी एक रिपोर्ट में यह साफतौर पर बताया गया है कि फेसबुक के सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की Hate speech और साम्प्रदायिक सामग्री को नजरअंदाज किया है, फेसबुक के पास ही वाट्सऐप और इंस्टाग्राम का भी स्वामित्व है।

निष्पक्षता को लेकर फेसबुक के दावों पर सवालिया निशान

      इस आरोप की वजह से फेसबुक पर चले 2014 और 2019 के चुनावी अभियानों को भी शक की निगाहों से देखा जाने लगा है क्योंकि इन दोनों चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी को भारी बहुमत मिला था।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक परंजॉय गुहा ठाकुरता

      वह कहते हैं ‘‘भारत में 40 करोड़ फेसबुक युजर्स है और 90 करोड़ वोटर, देश में चुनाव से पहले, बाद में और इसके दौरान इस मंच का दुरूपयोग होने दिया गया, (फेकन्यूज, साम्प्रदायिक सामग्री, Hate speech पर कोई लगाम नहीं लगाई गयी) जिससे लोगों का ब्रेनवॉस हुआ होगा

एक सुव्यवस्थित रीके से उनके दिमाग में घृणा, नफरत हृदय परिवर्तन साम्प्रदायिकता परोसी गयी होगी।

      सत्ताधारी दक्षिणपंथी दल की तथाकथित वॉट्सऐप की सेना इस कदर ‘हथियारबंद‘ कर दी गई है कि यह राजनीतिक परिणामों को प्रभावित कर सके।

फेसबुक और वॉट्सऐप दोनों यह दावा करते हैं कि वे निष्पक्ष हैं। लेकिन यह दावा हकीकत से कोसों दूर है।

      दुनिया के अलग-अलग देशों में विश्व के सबसे बड़े सोशल मीडिया संगठन पर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। इस पुस्तक में भारत में फेसबुक और वॉट्सऐप के कामकाज की पड़ताल आलोचनात्मक ढंग से कीगई है।

विश्लेषकों का कहना

      संक्षेप में‘‘आज की तारीख में फेसबुक और वॉट्सऐप जिस तरीके से काम कर रहे है, इससे न सिर्फ भारत में बल्कि पुरी दुनियाँ में लोकतंत्र को खतरा पैदा हुआ है।

दिल्ली दंगों का भूत फेसबुक के पीछे, विधानसभा समिति ने किया तलब

      दिल्ली दंगों के दौरान भड़काऊ बयानों को नहीं हटाने का फेसबुक का फैसला उस पर भारी पड़ता जा रहा है। संसद समिति के बाद दिल्ली विधानसभा की शांति और सद्भाव समिति ने भी भारत के प्रबंध निदेशक (एमडी) अजीत मोहन को मंगलवार को तलब किया।

समिति न सिर्फ उससे पूछताछ कर सकती हैद्व बल्कि उसके खिलाफ कार्यावाही के लिए भी कह सकती है।

फेसबुक को संलिप्त भी माना

      राघव चढ्ढा की अध्यक्षता वाली समिति के रुख का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है। इसने कहा कि समिति ने पाया कि फरवरी 2020 में हुए दंगों में प्रथमदृष्टया फेसबुक की भी संलिप्तता रही है।

संसद से ज्यादा गंभीर

      समिति के सूत्र बताते हैं कि इसका नजरिया संसदीय समिति से बिल्कुल अलग है। यहाँ फेसबुक को सिर्फ भड़काऊ सामग्री नहीं हटाने का दोषी नहीं माना जा रहा बल्कि दंगों में इसकी मिली-भगत की जांच की जा रही है।

इसी महीने संसदीय समिति में भी फेसबुक एमडी की पेशी हुर्इ थी। उस समिति में कांग्रेस सांसद शशि थरूर के अध्क्ष होने के बावजूद भाजपा के सदस्यों ने काफी सक्रियता दिखाई और साथ ही इसका कार्यकाल भी जल्दी ही समाप्त हो रहा है।

क्या कर सकती है समिति

      समिति ने पहले ही कहा कि स्वतंत्र जांच की जरूरत है। सुनवाई के बाद समिति पुलिस को एफआइआर या दूसरी जांच एजेंसियों को इसकी अगो की जांच के लिए कह सकती है।

दंगों से जुड़े मामलों में पूरक आरोप पत्र दाखिल करने को भी कह सकती है।

फेसबुक का दौहरा रवैया

      आलोचकों का कहना है कि फेसबुक अलग-अलग देशेां के लिए अलग-अलग नियम और दिशा निर्देश जारी करता है।

फेसबुक दूसरे देशों में सत्ताधारी दलों के आगे हथियार डाल देता है लेकिन अमेरिका में राजनीति से दूरी बनाता दिखाता है।

यह इसका दौहरा रवैया है या मजबूरी हालांकि फेसबुक ने माना है कि इस तरह के मामलों से बचने के लिए और काफी सुधार की गुंजाईश है बयान जारी किया कि ‘‘हमें पता है कि इस दिशा में अभी कुछ और कदम उठाने होंगे लेकिन हम अपनी प्रक्रिया के लगातार ऑडिट और उन्हें लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं ताकि हमारी निष्पक्षता और सटीकता पर आँच न आए।

  • क्या कारण है कि भारत के लोग इसका विरोध नहीं कर रहे ?
  • क्या भारतीयों के पास सही खबर का विश्लेषण करने की क्षमता नहीं है या कहीं उनका ब्रेनवॉश तो नहीं हो गया जिससे वे सही गलत को पहचान नहीं कर पाते।

संदर्भ

1.    फेसबुक जैसे सोशल मीडिया भारत के चुनावों को कितना प्रभावित करते हैं। (जुबैर अहमद BBC संवाददाता, 17 अगस्त, 2020)

2.    राजस्थान पत्रिका (भडकाऊ बयान का मामला) 13 सितम्बर, 2020

3.    हाँ, मैं ट्रोल हूँ- स्वाति चतुर्वेदी।

4.    The Real Face of Facebook in India – Paranjoy G. Thakurta.

5.    Satyagrah. Scroll.in

6.    लोकतंत्र को बहुसंख्यवाद का उपकरण बनाना न तो संविधान के अनुरूप है, न भारतीय संस्कृति के (अशोक वाजपेयी) 26 जनवरी, 2020

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