अनुच्छेद,धारा और अधिनियम में अंतर Diffrence bitween article-section and act

Difference between article, section and act

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Article and section
  • अनुच्छेद,धारा और अधिनियम में अंतर                     Diffrence bitween article,section and act

Article and section

 

किसी कानूनी प्रावधान ,प्रारूप को अच्छे से समझने के लिए हमेशा अनुच्छेद या धारा में विभाजित किया जाता है जिसे आसानी से प्रावधान समझ में आ जाए,आज हम इन्हीं अनुच्छेद और धारा के बारे में समझेंगे की क्या होते है इन में अंतर को समझेंगे

भारतीय संविधान का जब मसौदा तैयार किया जा रहा था तब संविधान सभा में हर एक आर्टिकल पर गहनता से चर्चा की गई थी जिससे इसके सिद्धांत, फीचर्स, प्रभाव व अर्थ गलत ना निकल इसमें हरएक आर्टिकल अपने आप में कानून की भांति है क्योंकि इनके जो बेसिक फीचर है वह कहीं बार ऊपर से दिखते नहीं

जैसे प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता,न्याय,समानता,स्वतंत्रता तथा बेसिकस्ट्रक्चर,विधिकाशासन,स्वतंत्रन्यायपालिका,विधायिका,कार्यपालिका,केंद्राराज्या संबंध,न्यायिक प्रक्रिया,न्यायिक सक्रियता,न्यायिक प्रथकक्करण आदि उनकी  सुप्रीम कोर्ट द्वारा सही व्याख्या करने पर वह हमें समझ में आती है उदाहरण के तौर पर इन केस लॉ को ही देख लीजिए 

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य।   

मेनका गांधी बनाम भारत संघ

एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ

इन केस लॉ में एक एक आर्टिकल की जब व्याख्या की गई तब पता चला कि आर्टिकल अपने आप में भी कानून से बड़े होते है। जहा कहीं पर भी कानून कि धारा और आर्टिकल में मतभेद होगा तब अनुच्छेद अधिमान प्राप्त करेगा।यह प्राथमिक कानून होते है जिन्हे संविधान में रखा जाता है यह सर्वोच्च विधि मानी जाती है।

अनुच्छेद :-

हमेशा सर्वोच्च कानून होते है जो अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में बात करते है। यह सिद्धांतो के रूप में भी हो सकते है तथा अपने आप में संपूर्ण विधि भी होते है की बात करते है।यह प्राथमिक कानून भी होते है,तथा इनका क्षेत्र भी विस्तृत होता है,यह अपने आप में कानून हो सकते है इसलिए इनका प्रभाव भी अधिक होता है। जहा भी इनका प्रयोग होगा वह अपने आप में सर्वोच्च कानून होंगे तथा दूसरे प्रावधान इनसे गोण होंगे ।
जैसे:

अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन के नियम,

संयुक्त राष्ट्र चार्टर

अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय चार्टर

भारत का संविधान

अन्य देशों के संविधान

परीसीमा अधिनियम 1963

धारा:-

धारा हमेशा किसी विशेष अधिनियम , विशेष शीर्षक, से संबंधित प्रावधान को समझने में मदद करता है यह ऐसे छोटे टुकड़ों में बताने का कार्य करती है जिससे टॉपिक आसानी से समझ में आ जाए विशेष प्रक्रिया विशेष संबंधों की बात करती है जो समझना चाहिए किसी अधिनियम को समझने में उसके अध्याय उसके प्रावधानों उसके प्रक्रिया को समझा जा सके।

धारा का अर्थ हमेशा अधिनियम के अंदर से ही लिया जाता है तथा धारा अधिनियम का ही भाग होती है यह एक से जादा कानूनों में प्रयोग में लाई जा सकती है यह द्वितीय कानून के रूम में होती है।इनका अलग अर्थ नही लिया जाता यह अधिनियम के उद्देश्य,अध्याय में समाहित रहती है।

अनुच्छेद हमेशा नागरिक कानून बनाने के लिए मौलिक कानून का कार्य करता है अनुच्छेद का अर्थ हमेशा एक जैसा रहता है।

परिसीमा अधिनियम 1963 के अनुच्छेद हमेशा समकक्ष उनके कानूनों से ऊपर होंगे ,अधिमान प्राप्त करेंगे तथा प्राथमिक कानून के रूप में होंगे।

संविधान संशोधन 2021,The constitution amendment

धारा हमेशा सुविधाजनक अर्थ निकलती है जिससे अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा किया जा सके की वह कहना क्या चाहते है।

अनुच्छेद संविधान के अंतर्गत दिए गए नियम हैं – जैसे भारत का संविधान|

धारा किसी विशेष सम्बन्ध में पारित किये गए किसी कानून – संहिता या अधिनियम के अंतर्गत दिए गए नियम हैं| जैसे भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि|

किसी कानून के प्रारूप को अच्छे से समझने के लिए उन्हें अनुच्छेद और धारा में विभाजित किया जाता है जिसे आसानी से उसके प्रावधान आमजन में लोगों को समझ में आ जाए

विधिक दस्तावेज,प्रारूप या कानून (विधायन) सीधे ही कहानी के रूप में न कहते हुए उसे भाग,अध्याय,धाराओं में विभाजित किया जाता है जिससे अधिनियम के उद्देश्य ,प्रावधानों, प्रक्रिया ,दंड, नियमों के बारे में आसानी से पता चल सके तथा उनका निर्वचन सही तरीके से किया जा सके।

यह वैसा ही है जैसे अनजान जंगल में रास्ता खोजना,दलदल से बाहर निकलने की कोशिश करना,समुद्र में किनारा ढूंढ़ना,इसलिए किसी भी कानून को बनाने वाले इसको आसानी से समझाने के लिए कई भागों में विभाजित करते फिर अध्याय बनाते उसके बाद विशेष महत्व के लिए धाराओं का निर्माण करते है

इसलिए व्यक्ति अधिनियम में उलझे नहीं और सही तरीके से उसका निर्वचन कर पाए और उन कानूनों के उद्देश्य को धाराओं के साथ समझ सके,उनका सही अर्थ निकाल पाए।

धारा हमेशा सुविधाजनक अर्थ निकलती है जिससे अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा किया जा सके की वह कहना क्या चाहते है।

किसी भी अधिनियम को पढ़ने के लिए उसके उद्देश्य,भाग,अध्याय,धारा को समझना होता है नहीं तो आपके लिए यह वैसा ही हो जाता है जैसे दलदल से बाहर निकलने के लिए हाथ पाव मारना और खुद ही उसमें फसते जाना,समुन्द्र में तेरकर किनारे तक पहुंचने की कोशिश करना यह व्यर्थ कार्य माने जाते है इसलिए अधिनियम को कहानी की तरह न लिखकर एक सिस्टेमेटिक तरीके से लिखा जाता प्रारूप तैयार किया जाता है जिससे कहीं त्रुटि,असमंजस,अवैध,शून्य ना हो पाए तथा अपने उद्देश्य को पूरा कर पाए व आम जनता को भी समझ आ जाए व उसका उपयोग स्वयं की सुविधा,समस्या के लिए कर पाए। 

अधिनियम

अधिनियम:- सबसे पहले कोई मसौदा तैयार किया जाता है किसी भी मंत्रालय द्वारा,फिर जब उसे संसद या विधानसभा में रखा जाता है तब वह बिल बन जाता है बिल जैसे ही संसद या विधानसभा से पास हो जाता वह अधिनियम बन जाता है लेकिन जब तक उस पर राष्ट्रपति या गवर्नर के हस्ताक्षर नहीं हो जाते वह कानून नहीं बन पाता है।अधिनियम का सही कियानव्यन हो इसलिए नियम बनाए जाते है।

भारत में अश्लीलता(पोर्नोग्राफी) संबंधी कानून Pornography related laws in india

विधयक जब संसद से पास होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद कानून का रूप धारण करता है उससे पहले वह कानून का प्रारूप मात्र होता हैAct का अर्थ अधिनियम होता है और  किसी विधेयक(bill) और कानून में बहुत अंतर होता है. क्‍योंकि विधेयक(Bill) किसी कानून का मसौदा,प्रारूप होता है. यानी कानून बनाने का जो प्रस्‍ताव संसद या विधानसभा के समक्ष रखा जाता है वह विधेयक या बिल कहा जाता है।और जैसे ही वह पारित होकर राष्ट्रपति के पास जाता है और उस पर हस्ताक्षर हो जाते है तब वह कानून बन जाता है।

अनुच्छेद 123 (अध्यादेश)

अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति के पास शक्ति है कि जब संसद के सत्र में न होने की स्थिति में अध्यादेश जारी कर सकता है यह अध्यादेश बनाए गए कानून के बराबर ही होता हैऔर यह तत्काल लागू हो जाता है। इसके अलावा राष्ट्रपति कभी भी अध्यादेश को वापस ले सकता है।

अधिनियम विधायिका द्वारा बनाये जाते हैं जबकि नियम सरकार द्वारा बनाये जाते हैं.अधिनियम पारित होने के बाद ही नियम बनाये जाते हैं जिससे उस एक्ट का पालन सही से करवाया जा सके। अधिनियम में आने वाली अनियमितताओं को दूर करने के लिए राज्य केंद्र सरकार नियम बना सकती है संशोधन कर सकती हटा सकती है।

अधिनियम के अंदर नियम आते हैं जो केंद्र या राज्य सरकार नियत करे।नियम के द्वारा ही कोई अधिनियम को लागू किया करवाया जाता है कोई कमी रह जाए तो नियम बनाकर उसको पूरा किया जाता है जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश, नियम(Rule,order)  भू राजस्व अधिनियम में नियम आदि