समान नागरिक संहिता Uniform Civil Code

Uniform civil code (UCC)

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UCC

UCC

समान नागरिक संहिता 

Uniform civil code (UCC)

Indian Constitution Article:- 44

समान नागरिक संहिता यानी सभी नागरिकों,धर्मो,समुदायों, के लिए एक समान कानून या कानूनी संहिता जो विवाह,विवाह विच्छेद,उतराधिकार,सम्पत्ति से सम्बन्धित हो।

लेकिन वर्तमान में यह पर्सनल लॉ के आधार पर ही चलते है जो हिन्दू लॉ,मुस्लिम लॉ, पारसी लॉ, विशेष विधि है। लेकिन इन सब कानूनों की अपनी-अपनी, अलग-अलग कानूनी प्रक्रिया  है। जिससे छुटकारा पाकर सबके लिए समान कानून बनाने की बात करता है आर्टिकल 44 यानी समान सिविल संहिता। जिससे न्याय शुलभ व विचारण तीव्रता से हो सके तथा प्रकरण भी लंबित ना रहे।

समान नागरिक संहिता (UCC) भारत में एक कानून बनाने की बात करती है, जो विवाह, तलाक, विरासत, गोद,सम्पत्ति लेने जैसे मामलों में सभी धर्मो, धार्मिक समुदायों पर लागू होगा।

  1. वैश्विक दृष्टिकोण में अधिकतर देशों में ऐसे कानून लागू हैं। जो समान नागरिक संहिता से संचालित, सम्बन्धित है ऐसे देशों की में निम्न है:-जैसे कि
    अमेरिका,
    आयरलैंड,
    पाकिस्तान,
    बांग्लादेश,
    मलेशिया,
    तुर्की ,
    इंडोनेशिया,
    सूडान,
    इजिप्ट,
    जैसे कई देश है जिन्होंने समान नागरिक संहिता लागू कर रखी है।

UCC

संहिता संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत आती है, जो यह बताती है कि राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।

यह मुद्दा कई वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा है। कोई राजनीतिक पार्टी इस में दखल नहीं देना चाहती राजनीतिक वोट बैंक के कारण,इससे अलग अलग धर्मो के पर्सनल लॉ होने से न्याय प्रणाली में भी केस लंबित रहते है वह महिला पुरुषों के अधिकारों में भी भेद है इसलिए समय की आश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इसको जल्द लागू करवाना चाहिए।

अनुच्छेद 44 क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय संविधान में निदेशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 44 का उद्देश्य कमजोर समूहों के खिलाफ भेदभाव को दूर करना और देश भर में विविध सांस्कृतिक समूहों में सामंजस्य स्थापित करना था।

डॉ. बीआर अम्बेडकर ने संविधान बनाते समय कहा था कि एक यूसीसी वांछनीय है लेकिन फिलहाल यह स्वैच्छिक रहना चाहिए, और इस प्रकार संविधान के मसौदे के अनुच्छेद 35 को भाग IV में राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों के एक भाग के रूप में जोड़ा गया था।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के रूप में। इसे संविधान में एक पहलू के रूप में शामिल किया गया था जो तब पूरा होगा जब राष्ट्र इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा और यूसीसी को सामाजिक स्वीकृति दी जा सकती है।

अम्बेडकर ने संविधान सभा में अपने भाषण में कहा था, “किसी को भी इस बात से आशंकित होने की आवश्यकता नहीं है कि यदि राज्य के पास शक्ति है, तो राज्य तुरंत अमल करने के लिए आगे बढ़ेगा …

समान नागरिक संहिता की उत्पत्ति

यूसीसी की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई जब ब्रिटिश सरकार ने 1835 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया गया, विशेष रूप से सिफारिश की गई कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को साथ रखा जाए। इस तरह से सामूहिक सौहार्द और एकता बनीं रहेगी और भेदभाव भी नहीं होगा

ब्रिटिश शासन के अंत में व्यक्तिगत मुद्दों से निपटने वाले कानूनों में वृद्धि ने सरकार को 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए बीएन राव समिति बनाने के लिए मजबूर किया। हिंदू कानून समिति का कार्य सामान्य हिंदू कानूनों की आवश्यकता के प्रश्न की जांच करना था। .

समिति ने, शास्त्रों के अनुसार, एक संहिताबद्ध हिंदू कानून की सिफारिश की, जो महिलाओं को समान अधिकार देगा। 1937 के अधिनियम की समीक्षा की गई और समिति ने हिंदुओं के लिए विवाह और उत्तराधिकार की नागरिक संहिता की सिफारिश की।

हिंदू कोड बिल क्या है?

राव समिति की रिपोर्ट का मसौदा बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में एक चयन समिति को प्रस्तुत किया गया था, जो 1951 में संविधान को अपनाने के बाद चर्चा के लिए आई थी। जबकि चर्चा जारी रही, हिंदू कोड बिल लैप्स हो गया और 1952 में इसे फिर से प्रस्तुत किया गया।

बिल को 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के रूप में अपनाया गया था ताकि हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों के बीच निर्वसीयत या अनिच्छुक उत्तराधिकार से संबंधित कानून में संशोधन किया जा सके। अधिनियम ने हिंदू व्यक्तिगत कानून में सुधार किया और महिलाओं को अधिक संपत्ति अधिकार, और स्वामित्व दिया। इसने महिलाओं को उनके पिता की संपत्ति में संपत्ति का अधिकार दिया।

अधिनियम 1956 के तहत निर्वसीयत मर जाने वाले पुरुष के लिए उत्तराधिकार के सामान्य नियम यह है कि कक्षा I के उत्तराधिकारी अन्य वर्गों के वारिसों की तुलना में वरीयता में सफल होते हैं। वर्ष 2005 में अधिनियम में एक संशोधन ने महिलाओं को वर्ग I के वारिसों में ऊपर उठाने वाले अधिक वंशज जोड़े। बेटी को उतना ही हिस्सा आवंटित किया जाता है जितना एक बेटे को आवंटित किया जाता है।

नागरिक कानूनों और आपराधिक कानूनों के बीच अंतर

जबकि भारत में आपराधिक कानून एक समान हैं और सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनकी धार्मिक मान्यताएं कुछ भी हों, नागरिक कानून आस्था से प्रभावित होते हैं। धार्मिक ग्रंथों से प्रभावित होकर दीवानी मामलों में लागू होने वाले व्यक्तिगत कानूनों को हमेशा संवैधानिक मानदंडों के अनुसार लागू किया गया है।


पर्सनल लॉ क्या हैं?

कानून जो लोगों के एक निश्चित समूह द्वारा उनके धर्म, जाति, आस्था और विश्वास के आधार पर रीति-रिवाजों और धार्मिक ग्रंथों के उचित विचार के बाद लागू होते हैं। हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों का स्रोत और अधिकार उनके धार्मिक प्राचीन ग्रंथों रूढ़ियों में मिलता है

हिंदू धर्म में, व्यक्तिगत कानून उत्तराधिकार, उत्तराधिकार, विवाह, गोद लेने, पालन, अपने पिता के कर्ज का भुगतान करने के लिए बेटों के दायित्वों, पारिवारिक संपत्ति के विभाजन, रखरखाव, संरक्षकता और धर्मार्थ दान से संबंधित कानूनी मुद्दों पर लागू होते हैं।

इस्लाम में, व्यक्तिगत कानून विरासत, वसीयत, उत्तराधिकार, विरासत, विवाह, वक्फ, दहेज, संरक्षकता, तलाक, मेयर और कुरान से पूर्व-उत्सर्जन से संबंधित मामलों पर लागू होते हैं।

विरोध क्यों हो रहा है? :
यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी)का विरोध करने वालों का कहना है कि ये सभी धर्मों पर हिन्दू कानून को लागू करने जैसा है। जबकि ऐसा कही लिखा हुआ नहीं है यह केवल आमजन में झूट फैलाया जा रहा है यह वेसा ही है जैसा आपराधिक कानून पूरे भारत में लागू है (भारतीय दंड संहिता) वैसे ही यह भी विवाह,तलाक,उतराधिकार,सम्पत्ति,के लिए एक जैसा कानून होगा।

क्या करेगी समान नागरिक संहिता?

यूसीसी का उद्देश्य महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित अम्बेडकर द्वारा परिकल्पित कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है, साथ ही एकता के माध्यम से सौहार्द और राष्ट्रवादी उत्साह को बढ़ावा देना है। जब यह कोड बनाया जाएगा तो यह उन कानूनों को सरल बनाने का काम करेगा जो वर्तमान में धार्मिक मान्यताओं जैसे हिंदू कोड बिल, शरीयत कानून और अन्य के आधार पर अलग-अलग हैं।

यह संहिता विवाह समारोहों, विरासत, उत्तराधिकार, गोद लेने के आसपास के जटिल कानूनों को सभी के लिए एक बना देगी। फिर वही नागरिक कानून सभी नागरिकों पर लागू होगा चाहे उनकी आस्था कुछ भी हो।

सभ्य भारतीय समाज में “धीरे-धीरे एकरूप होता जा रहा था, धर्म, समुदाय और जाति के पारंपरिक अवरोध धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं” और इस प्रकार यूसीसी को “मात्र आशा नहीं रहनी चाहिए”,इसे लागू भी किया जाना चाहिए

ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया तब से चर्चा में है कि समान सविल सहिता को लागू किया ज़ा सकता है।
प्रमुख केस लॉ:-
गुलशन प्रवीण ,इशरत जहान, अतिया शबरी बनाम भारत संघ(ट्रिपल तलाक केस)
शाहबानो केस
सरला मुद्गल बनाम भारत संघ
लिली थॉमस बनाम भारत संघ
डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ
आदि

यूसीसी से न्यायिक प्रक्रिया सरल व एक जैसी होने से मामलों का निपटारा सुलभ हो जाएगा तथा केस के लंबित रहने का समय भी कम होगा।जिससे सबको न्याय समय पर मिल पाएगा।महिला पुरुषों,विवाह,तलाक,भरनपोषण, बच्चो,सम्पत्ति,उतराधिकार, आदि के कानून एक जैसे होने से भेदभाव कम होगा तथा महिलाओं की स्तिथि में सुधार होगा।

अब समय आ गया है जब सरकार इस पर कानून बनाए क्योंकि ऐसे कानून कई देशों में पहले से मौजूद है जो एक नजीर पेश कर रहे है।भारत भी इसको लागू कर इतिहास रच सकता है नागरिक अधिकारों को लेकर।

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