अल्पमत में सरकार और वैकल्पिक उपाय

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अविश्वास प्रस्ताव

‘‘प्रंजातत्र एक सामाजिक व्यसस्धा है जिसका लक्ष्य सामान्य जनता के सर्वाधिक कल्याण में निहित है न कि एक वर्ग विशेष के कल्याण मंे । ’’

– जार्ज बनार्ड शाॅ


एक प्रजातान्त्रिक सरकार को न केवल संसदीय बहुमत की अपितु संसदीय अल्पमत की भी उतनी हो आवश्यकता है जो कि सुदृढ़ विरोधी दल के रूप में कार्य कर सके। संसदीय प्रंजातत्र तब तक सफलता पूर्वक कार्य नहीं कर सकता जब तक की सतारूढ दल और विरोधी दल अपने मध्य मतभेदों की शांति पूर्वक संवैधानिक तरीकों से हल कर पाने में असहमत न हो। एक नई सरकार विभिन्न विषयों पर विरोधी दलो के सदस्यों का सकारात्मक मत भी प्राप्त कर सकती है।

अल्पमत या कार्यवाहक सरकार जैसी कोई व्यवस्था भारतीय संविधान में नहीं हैं किसी एक अकेले सांसद को भी चाहे राष्ट्रपति की ओर से प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी जाती है, तो वह अपनी मर्जी का मन्त्रिमण्डल बनाकर पूरी सनक के साथ सरकार चला सकता है, बशर्ते संसद के अगले सत्र में लोकसभा के उपस्थिति सदस्यों का बहुमत उसके प्रति अविश्वास न जता दे।।

संसदीय प्रणाली लोकतंत्रिक शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका अपनी लोकतान्त्रिक वैधता विधायिका संसद से प्राप्त करती है तथा विधायिकता के प्रति उत्तरदायी होती है। अविश्वास प्रस्ताव वैकल्पिक रूप से अविश्वास निंदा प्रस्ताव , अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास प्रस्ताव पर मतदान एक संसदीय प्रस्ताव है जिसे पारपरिक रूप से विपक्ष द्वारा संसद मंें एक सरकार को हराने कमजोर करने की उम्मीद से रखा जाता है। एक तत्कालीन समर्थक द्वारा पेश किया जाता है जिसे सरकार मे विश्वास नहीं होता ,संसदीय मतदान द्वारा पारित /अस्वीकार किया जाता है।

एक समान कारण हेतु एक होना विचारों में सहमत होना तथा एक साथ कुछ लोगो या समुहो का एक साथ सयुक्त सहयोग देकर कोई कार्य करना गठबन्धन कहलाता है। अल्पमत सरकार, कैबिनेट, अल्पमत संसद, ससदीय प्रणाली में बना एक ऐसा कैबिनेट है जब कोई राजनीतिक दल या दलो के गढबन्धन के पास संसद का बहुमत न हो तो वह अल्पमत में आ जाती है। अस्थिर सरकार बन जाती हो गिर जाती या इस्तिफा दे देती है।


1 ब्रटिश लेखक
2 विधि महाविद्यालय (मो.ला.सु.वि.वि., उदयपुर)

जर्मनी में अस्थिरता को रोकने के लिए अविश्वास मत लाने से पहले किसी दुसरे चासंलर के नाम पर सहमति बनाना अनिवार्य होता है। जिससे सरकार कार्य करती रहे जब तक की नई सरकार नहीं बन जाती है नार्वे में भी चुनाव के बाद सरकार बनने मंे काफी वक्त लगता है, क्योकि सभी दल पहले से तय करते है कि वे किस रूप में सरकार में शामिल होगे। मसलन कौन सा विभाग किसके हाथ आएगा या दुसरी जिम्मेदारियो को कौन संभालेगा।


अविश्वास प्रस्ताव बहुदलीय प्रणालियो मंे ज्यादा आम है जिनमें एक अल्पसंख्यक दल को गठबन्धन सरकार बनानी पडती है यह एक ऐसी स्थिति पैदा करता है, जिसमें कई अल्पकालीन सरकारे बने, क्योक दलीय ढाॅचा छोटे दलों को सरकार बनाने के साधन के बिना एक सरकार को गिराने की अनुमति देता हे के चैथे गणराज्य और के वेमर गणतन्त्र की अस्थिरता के लिए ऐसी ही स्थितियों को कारण माना गया। इस हकीकत की हाल ही की मिसाले 1950 के दशक से और 1990 के दशक के बीच और मंे देखी गई।


इस स्थिति से निपटने के लिए फ्रांसिसियों ने फ्रांस के राष्ट्रपति को भारी कार्यकारी शक्तियां ही, जिससे कि उन्हे अविश्वास प्रस्ताव से सुरक्षा हासिल हो सके।
अमेरिका , कनाडा और वेनेजुएला क कुछ भागों में वापस बुलाने वाले चुनाव के जरिये अलोकप्रिय सरकार को हटाने की समान भूमिका अदा करता है, लेकिन अविश्वास प्रस्ताव के विपरित इस मतदान में सोर मतदाता शामिल होते हे।

वेस्ट मिनिस्टर प्रणालीः- ब्रिटेन , कनाडा, आस्टेªलिया , जर्मनी , स्पेन में वेस्ट मिनिस्टर प्रणाली में अगर सरकार स्वयं विघतन होने फैसला करती है या मजबूर होती है (अविश्वार प्रस्ताव से ) तो सम्राट या वायसराय अधिकारिक विपक्षी दल से पूछ सकते है कि ‘‘क्या वह सरकार बनाने के लिए तैयार है’’ इसके लिए दलों के एक गठबन्धन या समर्थन के एक समझौते की आवश्यकता हो सकती है

ताकि विपक्षी पार्टी को इतनी संसदीय सीट मिल जाये कि वह अपने खिलाफ लाये गये किन्ही विश्वास संबंधी चुनौतियों को झेल सके। अगर ऐसा नहीं किया जा सकता है तो संसद भंग कर दी जाती है और आम चुनाव की घोषणा हो जाती है।


हाल ही में जून 2017 ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसामें ने समय पूर्व मध्यावती चुनाव करवाये ताकि उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल जाये लेकिन इसके उलट उनकी सरकार पिछडकर अल्पमत में आ गई है लिहाजा एक बार फिर से ब्रिटेन में त्रिंशकु ससद के हालात पैदा हो गए है। परन्तु अल्पमत में होने के बावजुद उनकी पार्टी व धेरेसा में सरकार चलाती रहेगी ‘‘स्थायित्व’’ सुनिश्चित करेगी।


सम्राट या गर्वनर किसी दूसरी सरकार के गठन की पहल किये बिना संसद को भंग कर सकते है हांलाकि यह नये जनादेश के लिए चुनावों तक अन्य सरकार के गठन की तार्किन उम्मीद या बहुत दुर्लभ हालात में अकेले राॅयल परमाधिकार जैसे कारको पर निर्भर होता है।


गठबन्धन सरकारों से परेशान होकर तथा सरकार के अल्पमत में आ जाने व मध्यावर्ती चुनावों से परेशान होने पर 1993 में चुनाव सुधार के तौर पर फस्र्ट पास्ट द पोस्ट की जगह मिश्रित सदस्य आनुपातिक प्रणाली को अपनाया गया जो स्थाई सरकारे बनाने में कारगर साबित हुआ एम एम पी का ध्यये यह सुनिश्चित करना है

कि जिस पार्टी को ज्यादातर वोट मिले वे वोट संसद में जीते सीटों मंे भी प्रतिबिंबित हो, न्युजीलैण्ड में पार्टियों का 3 साल के अवधि के लिए देश पर शासन करने के लिए गठबन्धन फार्म चाहिए हालाकि विजेता पार्टी अन्य दलो के समर्थन के बिना भी विधेयक पारित करवा सकती है सरकारो के गठन के पूर्व ही राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन या समझौते आम तौर पर किया जाता है। इससे सरकार कभी अल्पमत में नहीं आती है तथा निरन्तर कार्य करती रहती है यही इसकी उपलब्धी है।

जर्मनी , स्पेन व इसराइल में एक अविश्वास मत में इस बात की आवश्यकता होती है कि विपक्ष उसी मतपत्र पर खुद के अपने उम्मीदवार का प्रस्ताव रखे, जिसकी वे राज्य का प्रमुख होने के लिए सबंधित राष्ट्र प्रमुख द्वारा नियुक्ति चाहते है इस तरह अविश्वास का प्रस्ताव भी उसी समय पेश किया जाता है जब नये उम्मीदवार इस बदलाव को अविश्वास के लिए रचनात्मक मतदान कहा जाता है।

के लिए विश्वास मत पेश होता है यह विचार देश पर किन्ही संकट को आने से रोकने के लिए होता है जैसा जर्मन वेमर गणराज्य के अंत समय में पैदा हुआ था और यह सुनिश्चित किया जाता है कि सरकार का प्रमुख कौन होगा, जिसके पास शासन करने के लिए पर्याप्त समर्धन है

ब्रिटिश प्रणाली के विपरीत विश्वास मताधिकार गिरने से जर्मन चांसलर को इस्तिफा नहीं देना होता है बशर्ते कि यह खुद उनके द्वारा पेश किया गया हो संसदीय विपक्ष द्वारा नहीं इसके बदले संघीय राष्ट्रपति को आय चुनाव कराने के लिए कह सकते है

जिस अनुरोध को राष्ट्रपति मान भी सकते है और नहीं भी। त्रिंशुक संसद की स्थिति तब बनती है जब किसी भी प्रमुख दल को सीटो की संख्या के अनुसार संसद में पूर्ण बहुमत प्राप्त नहं होता, इसे कभी कभार संतुलित संसद या बिना किसी नियत्रंण वाली विधायिका भी कहाॅ जाता है यदि विधायिका द्विसदनीय है और सरकार केवल अवर सदन के प्रति जिम्मेदार है तब ‘त्रिंशुल संसद’ शब्द का प्रयोग केवल उसी सदन के लिए किया जाता है इग्लैण्ड में इस तरह की अवधारणा बहुत प्रचलित है


यह नई सरकार व पूर्ण बहुमत का अपवाद है और इसे अवाछनीय माना जा सकता है एक या दोनो मुख्य पार्टियों कुछ अन्य छोटी पार्टियों के साथ गठबन्धन सरकार बनाने या कुछ अन्य पार्टियों अथवा स्वतन्त्र सदस्यों की सहायता से एक अल्पमत वाली सरकार बनाने की चेष्टा कर सकती है यदि ये प्रयास विफल हो जाये तो संसद भंग करने और नए सिरे से चुनाव कराए जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नही बचता है।

विश्व में इसके उदाहरण – यू.के., कनाडा,आस्टेªलिया
भारत की संसद में यह परम्परा रहीं है कि जब चुनावों में किसी एक दल या दलों को संसद में बहुमत नहीं मिला हो तो जो दल चुनावों से पहले ही अपने सहयोगी दलो को मिलाकर गठबन्धन बना ले तथा अपना घोषणा -पत्र जारी कर दे से सरकार बनाने व बहुमत सिद्ध करने का पहले मौका दिया जाये दूसरे संयुक्त मोर्चा से पहले। तथा स्पष्ट बहुमत नहीं होने पर लोकसभा में सबसे में सबसे बडंे दल को सरकार बनाने का निमन्त्रण दिया जाये।

निम्नलिखित विकल्पांे की सिफारिश
 सर्वप्रथम चुनाव के पूर्व बने गठबन्धन केेे नेता को बुलाना चाहिए।
 सबसे बडे दल के नेता को जो निर्दलीय सदस्यों व अन्य सदस्यों के समर्धन का दावा करता है का बुलाना चाहिये ।
 अविश्वास का प्रस्ताव आने पर विरोधी पक्ष के नेता को बुलाना चाहिए।
 दल-बदल या चुनाव क पश्चात बने गठबन्धन के नेता को बुलाना चाहिए।


साधारण परिस्थितियों में राष्ट्रपति के लिए कोई सन्देह करने की गुंजाइश नहीं होती है कि किसे प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाय। वह केवल विशेष परिस्थितियों में जब कि किसी दल को लोकसभा में बहुमत नहीं प्राप्त है अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है और ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है जो उसके अनुसार लोकसभा के बहुमत का विश्वास प्राप्त करने की स्थिति में हो और एक स्थायी सरकार बना सके।

ऐसी परिस्थितियों का भारत में जहाँ बहुदलीय प्रणाली है उत्पन्न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है किन्तुु संविधान वेत्ताओ का विचार है कि ऐसी परिस्थिति में भी राष्ट्रपति को अपनेे स्वविवेक के प्रयोग का कम अवसर प्राप्त होगा, क्योकि उसे कुछ मान्य परम्पराओं के अनुसार कार्य करना होता है

भारतीय संविधान में इसके लिए कोई स्पष्ट उपबन्ध नहीं है इग्लैण्ड की रूढियाॅ भारतीय परिस्थिति में लागू नही की जा सकती है ऐसी दशा में एक स्वस्थ परम्परा की नीव डालनी चाहिए। विभिन्न राज्यों में जो मामले उत्पन्न हुए थे उनके आधार पर कुछ सिद्धान्त हमारे समक्ष आये है। आवश्यकता केवल इस बात की अै कि उन्हे हम स्वीकार करे तथा उन पर आचरण करे।


त्रिंशकु ससंद की स्थिति में संविधानवेताओं ने भारत के राष्ट्रपति के लिये निम्नलिखित स्थितियाँ स्पष्ट कि है कि राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की नियुक्ति करते समय इन्हे प्राथमिकता देनी चाहिये।
 चुनाव के पहले बने स्ंाविद या गठबन्धन के नेता को
 सदन में सबसे बडे दल को
 चुनाव पश्चात बने गठबन्धन के नेता को
 मन्त्रिमण्डल के विरूद्ध अविश्वास प्राप्त होने पर विपक्ष के नेता को


यदि लोकसभा में किसी भी दल को बहुमत नहीं प्राप्त है तो राष्ट्रपति को सबसे बडे दल के नेता का पहले प्रधानमत्री नियुक्त करना चाहिए। इस रूढि के अनुसार कार्य करने पर राष्ट्रपति का कार्य सरल हो जायेगा और वह आलोचना का पात्र भी नहीं होगा। अधिकांश संविधानवेताओं का मत है कि यदि चुनाव के पूर्व कई दल मिल कर संयुक्त दल बनाते है तो उसके दल के नेता को पहले प्रधानमत्री नियुक्त करना चाहिए इसके पश्चात चुनाव के बाद बनाये गयै संयुक्त दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाना चाहिए।

सबसे बडे दल के नेता और चुनाव के पश्चात बने संयुक्त दल के नेता बीच में यदि अन्तर कम होतो सबसे बडे दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित करना चाहिए। यह निर्णय करना राष्ट्रपति का कार्य होगा कि दोनो में किसे लोकसभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त है।


भारत में 2014 से पूर्व 25 वर्षों तक गठबन्धन सरकारे रही है, जो नीति व प्रदर्शन की तुलना में राजनिती पर अधिक ध्यान देेने के लिए बाध्य रही। गठबन्धन सरकारों में समर्थन वापसी के डर से सरकार ऐसा करने के लिए बाध्य रही। संसदीय प्रणाली ने मतदाता के राजनीतिक अधिकार को भी कमजोर किया जिसमें मतदाता केवल उस व्यक्ति को ही जानता है जिसे वो वोट कर रहा है।

अल्पमत की स्थिति में राजनैतिक दलों को सदैव शिक्षा लेनी चाहिए की अपनी निजी स्वार्थो को त्याग कर देश को राजनैतिक स्थिरता प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए जिससे देश की जनता को आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक न्याय मिलता रहे। यह तभी संभव हो पायेगा जब सरकार व विपक्षी दल मिलकर राष्ट्रीयता की भावना को लेकर कार्यकाल पूर्ण करे।

यही देशहित में होगा । परन्तु यह संभव तभी होगा जब बहुमतदल एक उद्देश एक मुद्दे पर कार्य करे तथा विपक्ष भी उनका इसमें सहयोग प्रदान करे लेकिन भारत में अभी गठबन्धन चलाने की नीति अभी उतनी विकसित नहीं हुई जितनी विश्व के कई देशो में हुई है

यहाॅ राष्ट्रपति की भूमिका भी अहम हो जाती है वह संवैधानिक परम्पराओं के अनुसार कार्य करते हुए ऐसा निर्णय ले जो जनहित व देश के लिए सही साबित हो तथा देश में अल्पमत की स्थिति में भी स्थिरता बनी रहे जिससे लोकतन्त्र की मजबुती की नींव सुदृढ बने।

  • राष्ट्रपति की स्वविवेक शक्ति को बढायाॅ जाये(फ्रान्स राष्ट्रपति की तरह अंतिम व निणार्यक समय में उचित समाधान निकाल सके व संविधान में भी संशोधन कर शक्तियों का बढायाॅ जाये।
  • विश्वासमत पर मतदान के दौरान यदि सत्ताधारी दल को समान मत मिलते है तो राष्ट्रपति (संसद व राज्य विधानसभा के मामलो में) को यह विवेकाधिकार होना चाहिये की वह सरकार को बहुमत प्राप्त होने या बहुमत खोने या सदन की अवधि समाप्त(जो भी पहले हो) होने तक कार्य करने दे।
  • ससंदीय प्रणाली बन्द हो ओर राष्ट्रपती प्रणाली को लागू किया जाये
  • राज्य सभा में बहस हो अटाॅर्नी जनरल से इस पर कानूनी सलाह लेकर वैकल्पिक रास्ता निकाला जाये।
  • विधि विशेषज्ञो की राय ली जाये
  • त्रिशकु संसद की स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा निर्णायक फैसला ले।
  • डिप्टीनेरी केबिनेट द्वारा अस्थाई सरकार चलाई जाये निदरलैण्ड (डच) की भाती
  • राज्यों कि स्थिती में अनुच्छेद 356 लागू किया जाये।
  • न्यूजीलैण्ड की भाती (एम.एम.पी.) को लागू किया जाये जिससे स्थाई मिश्रित सरकार का निर्माण होगा (गठबन्धन की समाप्त)
  • राष्ट्रपति/राज्यपाल के कार्यो में पारदर्शिता हो जिससे सही दल को सदन में बहुमत सिद्ध करने व सरकार बनाने का मौका मिलेगा और स्थाई सरकार का निर्माण होगा।
  • राष्ट्रपति/राज्यपाल के कार्यो , निर्णयों को चुनौती उच्चतम न्यायालय में जाये जिससे पारदर्शिता आएगी।
  • चुनाव प्रक्रियाओं में व्यापक सुधार किया जाये।
  • सरकार के गठन के पूर्व ही राजनैतिक दलों के बीच गठबन्धन या समझौते आमतौर पर किये जाए।


संदर्भ :

  • विकिपीडिया.काॅम
  • विकासपीडिया.काॅम
  • भारत का संविधान – डाॅ. जय नारायण पाण्डेय (44 संसकरणद्ध
  • भारत का संविधान – डाॅ. बी.एल. फडिया
  • भारत में प्रजातंत्र का भविष्य
  • नवभारत टाईम्स 22 सितम्बर 2012 (अल्पमत की स्थिती)
  • युनियनपीडिया.काॅम